कभी कभी थक गिरना भी अछ्छा होता।
पत्ता चल जाता है की पैरों के निचे भी ज़मीन है।
पत्ता चल जाता है कौन कितना करीब है।

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अकेले आये है

अकेले आये थे दुनिया में अकेले ही जाना है।
सोचा था यादो का जहाँ साथ जायेगा।
अब तो यादें भी दर्द देती है।
छोड़ कर इन्हें मुसाफिर तू अकेला ही जायेगा।

सोचा ना था ऐसा भी होगा।

कभी सोचा ना था ऐसा भी होगा।
हम दुसरो के आसरे हो जायेंगे।
वक़्त ना होगा किसी को भी हमारे लिए।
हम खुद से ही तन्हा हो जायेंगे।
कोई सोच भी नहीं सकता किसी के दिल की बात।
हम खुद की नज़रो के काबिल भी ना होंगे।
समझ भी ना पाएंगे खुद के जज़्बातों को।
हम खुद ही अपने खुदा के काबिल हो जायेंगे।
वक्त की बातें कौन बाटेंगा हम से।
हम खुद से ही जुदा हो जायेंगे।
अब तो रूह भी देती है दागा ।
हम ना समझे कि हमें क्या हुआ।
कातिल हो गए है खुद के ।
ज़माने को क्यों अब दे सज़ा।